मुझे मालूम न था......

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मुझे मालूम न था मेरी चाहत ऐसे भी रंग दिखलाएगी,
तू रहेगी बेखबर और ये दुनिया मुझ पर मुस्कुराएगी|

मेरी चाहत का तेरी तबियत पर क्या ही असर होता,
दिलों के फ़ासलों को ये ज़मीं कैसे मिलाएगी|

तेरे हाथों की लकीरों में चाँद-सितारें विनीत हुए,
मुझ से फकीरों के चिरागों को तू आखिर क्यों जलाएगी|

जहान-ए-हकीकत में अब नहीं बढ़ते कदम मेरे,
ख्वाब-ए-हुकूमत में तो तू ही मेरा घर सजाएगी|

तेरा एहसास ही काफी है मेरे जज़्बातों की खातिर,
तू सामने गर आई ये सांस थम ही जाएगी|

मुझे मालूम न था मेरी चाहत आँखों के दरिया में डूब जाएगी,
तू रहेगी बेखबर और ये दुनिया मुझ पर मुस्कुराएगी|


आत्म-सम्मान

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गंगा यमुना की पावन धरती का क़र्ज़ महान लिखो,
हर गरीब की मेहनत की रोटी का तुम प्रमाण लिखो|

पंछी अपने पंख फैलाकर उड़ गया आकाश की ओर,
पथ पर आगे बढ़ते-बढ़ते पदचिन्हों की शान लिखो|

आकाश के चमकते तारे देखो टूट गिरे इस धरती पर,
धरा पर रहकर तुम अपना अम्बर से ऊँचा मान लिखो|

बंद आँखों-से देखी सपनों की दुनिया तो जन्नत है,
आँखें खोलकर हकीकत में चंद सपनों की उड़ान लिखो|

आज हर कोई झूठी शान-ओ-शौकत से ही जीता है,
साधारण से व्यक्तित्व से अपनी उच्च पहचान लिखो|

दूसरों की नज़रों में ऊपर उठना ही क्या मकसद है,
सबसे ऊपर दिल में अपने थोड़ा आत्म-सम्मान लिखो|

जल

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जल

जल जल के ही तो सीखा है जल ने
जलती आग बुझाना
क्या ख़ाक जलेगा तू जल-सा
राख तूने है बन जाना |


पूछा था एक दिन मैंने जल से
कैसे थी आग बुझाई
वीर और पौरुषता की
उसने थी कथा सुनाई|


इंसानियत का उसने वो
नंगा नाच दिखाया था
इन्सान होने का दंभ उसी दिन
चूर चूर हो आया था|


जल ने बताया था जो मुझको
लो आज तुम्हें बतलाता हूँ
जल की जो सत्य कहानी है
उसी की ज़बानी सुनाता हूँ:-

पैसे के भूखे भेड़िये जब तूने
अपनी बहु को आग लगाई थी
जलती हुई लक्ष्मी देख तुझे
ज़रा भी लज्जा ना आई थी
तूने उसके संस्कारों को तब
कागज़ के टुकडो से तौला था
उस बेसहारा बेकसूर को
अग्नि परीक्षा के लिए छोड़ा था

तड़पती उस मासूम को देख
आँख मेरी भर आई थी
और उसकी जान बचाने को
मैंने खुद को आग लगायी थी|


भोग-विलासिता का जीवन जीता है
खुद को राजा बतलाता है
घर को जिस बिजली से रोशन करता
उसी से जब तेरा घर जल जाता है
रोता बिलखता है तब तू
दिवालिया तक हो जाता है
माँ बच्चो को गले लगा
तू अपना दुखड़ा गता है
हर किसी के आगे पीछे
दया के लिए चिल्लाता है
कल तब जिसको पाँव की मिटटी समझा
उसी को माथे का तिलक बनाता है|
तेरी ऐसी दशा देख के
दया सिर्फ मुझको ही आई थी
और तेरी जान बचाने को मैंने
खुद को आग लगाई थी|


अराजकता और साम्प्रदायिकता की

जब तूने चिंगारी भड़काई थी

धर्म के नाम पर धरती माँ के

आँचल में आग लगाई थी

खैर कहाँ थी गरीब के खेतों की

ऊँची इमारतों तक को दफनाया था

अपने धर्म की रक्षा के नाम पे

दूसरों को तूने काट खाया था

मेरी धरती माँ के सीने पे

लाखों तलवारें चलवाई थी

मेरे होते हुए तूने खून की नदियाँ बहाई थी|

इस नरसंहार में, इस धधकती आग में

जलती तेरी माँ-बहन पर जब

किसी को लज्जा ना आई थी

तेरे कुनबे की अस्मत तब

मैंने ही बचाई थी

मैंने खुद को आग लगाई थी|

पूछता है फिर भी तू मुझसे

ये बाढ़ क्यों त्राहि मचाती है

अरे! रोता है मेरा भी हृदय

कभी-कभी आँख मेरी भी भर आती है|

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कहाँ है दम इन बादलों में

कोई आके मुझे समझाए,

फूट फूट रो पड़े है

ये भी गरजने के बाद|

दाग

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दाग

ख़त्म हो गए आँसू ना जाने कितने हैं राज़
क्यों करता रहता हूँ फिर भी मैं इतने पाप|

पलकें नाम हैं आज जैसे हो दूब पे ओंस पड़ी,
क्यों होती हैं हर सुबह के बाद अंधेरी रात|

दिखते है कई साए शीशे में पत्थर जैसे,
क्यों नहीं दिखती बस मेरी सूरत जैसी इनमें बात|

कितने रंग बदलती है लिबासों की तरह ये ज़िन्दगी,
क्यों इन रंगों में घुले पागल दिल के जज़्बात|

कई मौसम बदले, कई रातों में बदली शामें,
मोम नहीं है दिल मेरा फिर क्यों है इतने गहरें दाग|